बंगाल पर अंग्रेजों का आधिपत्य: सिराजुद्दौला, प्लासी का युद्ध, मीर जाफर, मीर कासिम एवं बक्सर युद्ध MCQ
भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की वास्तविक नींव बंगाल से रखी गई। 1757 ई. का प्लासी का युद्ध और 1764 ई. का बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की दो अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं। इन युद्धों के परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने बंगाल पर अपना राजनीतिक नियंत्रण स्थापित किया और आगे चलकर पूरे भारत में अपना साम्राज्य फैलाया। प्रतियोगी परीक्षाओं में इस अध्याय से अनेक प्रश्न पूछे जाते हैं।
भाग 1: बंगाल के नवाब, सिराजुद्दौला और ब्लैक होल की घटना
Q1. मुगल साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले प्रांतों में 'बंगाल' को सर्वाधिक संपन्न राज्य क्यों माना जाता था?
उत्तर: अत्यधिक व्यापारिक और कृषि समृद्धि के कारण।
स्पष्टीकरण: मुगल काल में बंगाल भारत का सबसे उपजाऊ और आर्थिक रूप से सुदृढ़ प्रांत था, जहाँ से सूती वस्त्र, रेशम, शोरा और अफीम का बड़े पैमाने पर निर्यात होता था। इसके अंतर्गत आधुनिक पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार और उड़ीसा के क्षेत्र शामिल थे। अपनी भौगोलिक स्थिति और हुगली जैसे प्रमुख बंदरगाहों के कारण डच, अंग्रेज और फ्रांसीसी सभी यूरोपीय कंपनियों ने यहाँ अपने प्रमुख व्यापारिक केंद्र स्थापित किए। मुगलों के केंद्रीय नियंत्रण के कमजोर होते ही यह लगभग एक स्वतंत्र और अत्यंत धनी राज्य के रूप में उभरा।
Q2. बंगाल में स्वतंत्र राज्य की नींव रखने वाला पहला अंतिम दीवान या नवाब कौन था?
उत्तर: मुर्शिद कुली खाँ।
स्पष्टीकरण: मुर्शिद कुली खाँ को वर्ष 1700 ई. में मुगल सम्राट औरंगज़ेब द्वारा बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था। उसने धीरे-धीरे मुगलों की कमजोर स्थिति का फायदा उठाकर खुद को बंगाल का स्वतंत्र शासक बना लिया, हालांकि वह नियमित रूप से मुगल बादशाह को राजस्व (खिराज) भेजता रहा। उसने बंगाल में इजारेदारी (ठेकेदारी) प्रथा की शुरुआत की और किसानों को आर्थिक राहत देने के लिए 'तकावी ऋण' (खेती के लिए अग्रिम कर्ज) की व्यवस्था की। उसके शासनकाल में बंगाल की आर्थिक स्थिति बेहद मजबूत हुई और राजनीतिक स्थिरता आई।
Q3. नवाब मुर्शिद कुली खाँ ने बंगाल की प्रशासनिक राजधानी को ढाका से कहाँ स्थानांतरित किया था?
उत्तर: मुर्शिदाबाद।
स्पष्टीकरण: इससे पहले बंगाल की राजधानी ढाका (आधुनिक बांग्लादेश) हुआ करती थी, जो प्रशासनिक और व्यापारिक दृष्टि से केंद्रीय मुगलों से दूर पड़ती थी। मुर्शिद कुली खाँ ने अपने नाम पर हुगली नदी के तट पर 'मुर्शिदाबाद' नामक एक नए शहर की स्थापना की और 1704 ई. में अपनी राजधानी वहाँ ले गया। यह स्थान भौगोलिक रूप से बंगाल के केंद्र में स्थित था, जिससे पूरे प्रांत के व्यापार और राजस्व संग्रह पर कड़ी निगरानी रखना आसान हो गया। राजधानी बदलने के इस फैसले ने मुर्शिदाबाद को कला, संस्कृति और व्यापार का एक महान केंद्र बना दिया।
Q4. वर्ष 1740 ई. में हुए 'गिरिया के युद्ध' का क्या परिणाम हुआ और इसने बंगाल के इतिहास को कैसे बदला?
उत्तर: अलीवर्दी खाँ ने सरफराज खाँ को मारकर सत्ता पर कब्जा कर लिया।
स्पष्टीकरण: गिरिया का युद्ध 1740 ई. में बिहार के नायब नाज़िम अलीवर्दी खाँ और बंगाल के तत्कालीन नवाब सरफराज खाँ (मुर्शिद कुली खाँ के वंशज) के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध में अलीवर्दी खाँ ने सरफराज खाँ की हत्या कर दी और खुद को बंगाल का नया नवाब घोषित कर दिया। सत्ता हथियाने के बाद अपनी स्थिति को वैध बनाने के लिए उसने मुगल बादशाह को दो करोड़ रुपये की भारी घूस (नजराना) दी। इसके बाद उसने अपने पूरे शासनकाल में मुगलों को राजस्व देना पूरी तरह बंद कर दिया, जिससे बंगाल व्यावहारिक रूप से पूर्ण स्वतंत्र हो गया।
Q5. नवाब अलीवर्दी खाँ ने यूरोपीय कंपनियों (विशेषकर अंग्रेजों) की तुलना किससे की थी?
उत्तर: मधुमक्खियों के छत्ते से।
स्पष्टीकरण: अलीवर्दी खाँ एक दूरदर्शी शासक था जो भारत में यूरोपीय कंपनियों की बढ़ती राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और उनकी सैन्य शक्ति से भली-भांति परिचित था। उसने अपनी प्रसिद्ध उक्ति में अंग्रेजों की तुलना मधुमक्खियों से करते हुए कहा था कि "यदि इन्हें न छेड़ा जाए तो ये शहद देंगी, और यदि इन्हें छेड़ा जाए तो ये काट-काटकर मार डालेंगी।" यही कारण था कि उसने अपने शासनकाल में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों को अपने प्रांत में फैक्ट्रियों की किलेबंदी करने की अनुमति कभी नहीं दी। वह उनके साथ केवल व्यापारिक संबंध बनाए रखने का समर्थक था, राजनीतिक हस्तक्षेप का नहीं।
Q6. अलीवर्दी खाँ की मृत्यु के बाद वर्ष 1756 ई. में बंगाल के सिंहासन पर कौन बैठा?
उत्तर: नवाब सिराजुद्दौला।
स्पष्टीकरण: अलीवर्दी खाँ का कोई पुत्र नहीं था, केवल तीन पुत्रियाँ थीं। इसलिए उसने अपनी मृत्यु से पहले ही अपनी सबसे छोटी पुत्री के पुत्र 'सिराजुद्दौला' (मिर्जा मुहम्मद) को अपना उत्तराधिकारी चुन लिया था। अप्रैल 1756 ई. में अलीवर्दी खाँ की मृत्यु के बाद मात्र 23 वर्ष की आयु में सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। कम उम्र और उग्र स्वभाव के कारण उसे गद्दी बैठते ही अपनों और परायों दोनों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। उसके नवाब बनते ही बंगाल की राजनीति में एक अत्यंत उथल-पुथल भरे दौर की शुरुआत हुई।
Q7. नवाब सिराजुद्दौला के गद्दी पर बैठते ही उसके प्रमुख आंतरिक विरोधी कौन-कौन थे?
उत्तर: घसीटी बेगम, शौकत जंग और मीर जाफर।
स्पष्टीकरण: सिराजुद्दौला के नवाब बनते ही उसके अपने सगे संबंधियों ने बगावत कर दी, जिसमें उसकी सगी मौसी 'घसीटी बेगम' (ढाका की शासक) प्रमुख थी। दूसरा बड़ा विरोधी उसका मौसेरा भाई 'शौकत जंग' था, जो पूर्णिया का नवाब था और खुद बंगाल की गद्दी पर दावा ठोक रहा था। इन घरेलू दुश्मनों के अलावा नवाब की सेना का सेनापति 'मीर जाफर' और दीवान 'राय दुर्लभ' भी अंदर ही अंदर नवाब को हटाने की साजिश रच रहे थे। इन सभी आंतरिक विरोधियों को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने नवाब को कमजोर करने के लिए गुपचुप तरीके से शरण और राजनीतिक समर्थन देना शुरू कर दिया था।
Q8. नवाब सिराजुद्दौला ने 15 जून 1756 ई. को अंग्रेजों के किस प्रमुख गढ़ पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया था?
उत्तर: फोर्ट विलियम (कलकत्ता)।
स्पष्टीकरण: नवाब सिराजुद्दौला अंग्रेजों द्वारा की जा रही कलकत्ता की अवैध किलेबंदी और दस्तक (मुफ्त व्यापार पास) के दुरुपयोग से बेहद नाराज था। जब अंग्रेजों ने नवाब के आदेशों को मानने से इनकार कर दिया, तो नवाब ने एक विशाल सेना के साथ कलकत्ता के 'फोर्ट विलियम' पर धावा बोल दिया। 20 जून 1756 ई. को अंग्रेजों को आत्मसमर्पण करना पड़ा और गवर्नर ड्रेक अपने सैनिकों के साथ जान बचाकर फुल्टा द्वीप भाग गया। नवाब ने कलकत्ता को जीतने के बाद उसका नाम बदलकर 'अलीनगर' रख दिया और उसकी जिम्मेदारी अपने एक अधिकारी मानिकचंद को सौंप दी।
Q9. भारतीय इतिहास की प्रसिद्ध और विवादित 'ब्लैक होल त्रासदी' (काल कोठरी की घटना) क्या थी?
उत्तर: एक छोटी कोठरी में 146 अंग्रेजों को बंद करने की घटना जिसमें 123 की दम घुटने से मौत हो गई।
स्पष्टीकरण: यह घटना 20 जून 1756 ई. की रात को फोर्ट विलियम (कलकत्ता) के पतन के बाद घटित हुई बताई जाती है। जीवित बचे ब्रिटिश अधिकारी जे.जेड. हॉलवेल के अनुसार, नवाब सिराजुद्दौला ने 146 अंग्रेज युद्धबंदियों (जिसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे) को 18 फीट लंबी और 14 फीट चौड़ी एक बेहद छोटी और हवाविहीन कोठरी में बंद कर दिया था। जून की भीषण गर्मी और दम घुटने के कारण अगली सुबह तक 146 में से केवल 23 अंग्रेज ही जीवित बच पाए, जिनमें हॉलवेल भी शामिल था। आधुनिक इतिहासकार इस घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई मनगढ़ंत कहानी मानते हैं, जिसका इस्तेमाल अंग्रेजों ने युद्ध भड़काने के लिए किया था।
भाग 2: प्लासी का युद्ध और मीर जाफर का नवाब बनना
Q10. कलकत्ता के पतन और ब्लैक होल की खबर मिलने पर अंग्रेजों ने मद्रास से किसके नेतृत्व में सैन्य अभियान भेजा?
उत्तर: रॉबर्ट क्लाइव और एडमिरल वाटसन।
स्पष्टीकरण: जब कलकत्ता के पतन और काल कोठरी की घटना की खबर मद्रास प्रेसिडेंसी पहुँची, तो वहाँ हड़कंप मच गया। ब्रिटिश अधिकारियों ने तुरंत स्थिति को संभालने के लिए कर्नल 'रबर्ट क्लाइव' के नेतृत्व में एक पैदल सेना और एडमिरल 'वाटसन' के नेतृत्व में एक शक्तिशाली नौसैनिक बेड़ा बंगाल भेजा। क्लाइव ने बंगाल पहुँचते ही सैन्य बल और कूटनीति का सहारा लिया। उसने नवाब के प्रभारी मानिकचंद को भारी रिश्वत देकर बिना किसी बड़े संघर्ष के जनवरी 1757 ई. में कलकत्ता पर दोबारा अंग्रेजों का नियंत्रण स्थापित कर लिया।
Q11. फरवरी 1757 ई. में नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच कौन सी प्रसिद्ध संधि हुई थी?
उत्तर: अलीनगर की संधि।
स्पष्टीकरण: कलकत्ता पर अंग्रेजों के दोबारा कब्जे और अहमद शाह अब्दाली के संभावित आक्रमण के डर से मजबूर होकर नवाब सिराजुद्दौला को झुकना पड़ा। 9 फरवरी 1757 ई. को दोनों पक्षों के बीच 'अलीनगर की संधि' पर हस्ताक्षर किए गए। इस संधि के तहत नवाब ने अंग्रेजों को उनके पुराने व्यापारिक अधिकार वापस दे दिए और कलकत्ता की किलेबंदी करने तथा अपने सिक्के ढालने की कानूनी अनुमति भी प्रदान की। इसके अलावा नवाब को अंग्रेजों को युद्ध के हर्जाने के रूप में 3 लाख रुपये देने पड़े, जिससे नवाब की प्रतिष्ठा को भारी धक्का पहुँचा।
Q12. रॉबर्ट क्लाइव ने नवाब सिराजुद्दौला को गद्दी से हटाने के लिए किन प्रमुख भारतीय गद्दारों के साथ मिलकर एक गुप्त समझौता किया था?
उत्तर: मीर जाफर, राय दुर्लभ, जगत सेठ और अमिचंद।
स्पष्टीकरण: अलीनगर की संधि के बाद भी क्लाइव संतुष्ट नहीं था और वह बंगाल में एक कठपुतली शासक चाहता था। उसने नवाब के असंतुष्ट दरबारियों के साथ मिलकर एक गहरी साजिश रची, जिसका मुख्य सूत्रधार नवाब का मीर बख्शी (सेनापति) 'मीर जाफर' था, जिसे अंग्रेजों ने बंगाल का नवाब बनाने का लालच दिया था। इस गुप्त गुट में बंगाल का सबसे बड़ा बैंकर 'जगत सेठ', दीवान 'राय दुर्लभ' और व्यापारी 'अमिचंद' भी शामिल थे। इन सबने मिलकर तय किया कि आगामी युद्ध में मीर जाफर के नेतृत्व वाली नवाब की मुख्य सेना निष्क्रिय रहेगी और अंग्रेजों की जीत का रास्ता साफ करेगी।
Q13. भारतीय इतिहास को बदलने वाला प्रसिद्ध 'प्लासी का युद्ध' किस तारीख को और कहाँ लड़ा गया था?
उत्तर: 23 जून 1757 ई. को नदिया जिले के प्लासी नामक स्थान पर।
स्पष्टीकरण: यह ऐतिहासिक युद्ध 23 जून 1757 ई. को बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के दक्षिण में स्थित 'प्लासी' (भागीरथी नदी के किनारे) के मैदान में लड़ा गया था। एक तरफ नवाब सिराजुद्दौला की लगभग 50,000 की विशाल सेना थी और दूसरी तरफ रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में मात्र 3,200 ब्रिटिश सैनिक थे। यह वास्तव में कोई वास्तविक युद्ध नहीं था, बल्कि एक पूर्व-नियोजित धोखा था। मीर जाफर और राय दुर्लभ की गद्दारी के कारण नवाब की आधी से अधिक सेना बिना एक भी गोली चलाए मैदान से पीछे हट गई, जिससे अंग्रेजों की आसानी से जीत हो गई।
Q14. प्लासी के युद्ध में नवाब सिराजुद्दौला के प्रति वफादार रहने वाले और वीरता से लड़ने वाले दो देशभक्त सेनापति कौन थे?
उत्तर: मीर मदान और मोहन लाल।
स्पष्टीकरण: जहाँ एक तरफ मीर जाफर जैसे बड़े अधिकारी अंग्रेजों से मिले हुए थे, वहीं नवाब की सेना के दो छोटे और अत्यंत वफादार अधिकारी 'मीर मदान' और 'मोहन लाल' अपनी छोटी सी सैनिक टुकड़ी के साथ अंग्रेजों पर टूट पड़े। उन्होंने ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान पहुँचाया और डटकर मुकाबला किया। युद्ध के दौरान अचानक एक तोप का गोला लगने से मीर मदान वीरगति को प्राप्त हो गए। मीर मदान की मृत्यु से नवाब सिराजुद्दौला बुरी तरह डर गया और उसने मीर जाफर की कुटिल सलाह पर युद्ध के बीच में ही अपनी सेना को पीछे हटने का आदेश दे दिया, जो उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई।
Q15. प्लासी के युद्ध के ठीक बाद नवाब सिराजुद्दौला की हत्या किसने और कहाँ की थी?
उत्तर: मीर जाफर के पुत्र मीरन ने मुर्शिदाबाद में।
स्पष्टीकरण: युद्ध के मैदान में गद्दारी का अहसास होते ही नवाब सिराजुद्दौला अपनी जान बचाकर ऊँट पर सवार होकर मुर्शिदाबाद की ओर भागा। वह वहाँ से अपनी पत्नी के साथ पटना भागने की योजना बना रहा था ताकि दोबारा सेना इकट्ठी कर सके। लेकिन मीर जाफर के क्रूर पुत्र 'मीरन' ने नवाब का पीछा किया और उसे मुर्शिदाबाद में पकड़ लिया। मीरन के आदेश पर मोहम्मद अली बेग नामक सैनिक ने सिराजुद्दौला की बेरहमी से हत्या कर दी। इस प्रकार बंगाल के अंतिम स्वतंत्र नवाब का दर्दनाक अंत हो गया और बंगाल पर अप्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन की शुरुआत हुई।
Q16. प्लासी के युद्ध के दूरगामी राजनीतिक और आर्थिक परिणाम क्या हुए?
उत्तर: अंग्रेजों का बंगाल के संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण हो गया और ब्रिटिश साम्राज्य की नींव पड़ी।
स्पष्टीकरण: प्लासी के युद्ध ने भारत के इतिहास को पूरी तरह बदल दिया। इस युद्ध की जीत ने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक साधारण व्यापारिक संस्था से उठाकर बंगाल की वास्तविक राजनीतिक शक्ति बना दिया। अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में बिना किसी टैक्स के मुक्त व्यापार का एकाधिकार मिल गया। इसके साथ ही बंगाल के विशाल खजाने का इस्तेमाल करके अंग्रेजों ने अपनी सेना को आधुनिक बनाया, जिसकी बदौलत उन्होंने आगे चलकर पूरे भारत को गुलाम बना लिया। प्रसिद्ध इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने प्लासी के पतन को भारत के लिए "मध्यकाल का अंत और शाश्वत अंधकार के युग की शुरुआत" कहा था।
Q17. प्लासी की जीत के पुरस्कार के रूप में अंग्रेजों को बंगाल में कौन सी बड़ी जमींदारी प्राप्त हुई थी?
उत्तर: 24 परगना की जमींदारी।
स्पष्टीकरण: समझौते के अनुसार, मीर जाफर को नवाब बनाने के बाद कंपनी ने उससे भारी कीमत वसूली। मीर जाफर ने ईस्ट इंडिया कंपनी को कलकत्ता के दक्षिण में स्थित '24 परगना' (24 Parganas) नामक एक अत्यंत उपजाऊ और विशाल क्षेत्र की जमींदारी सौंप दी। इस क्षेत्र से होने वाली समस्त भू-राजस्व की आय अब सीधे ब्रिटिश कंपनी के खाते में जाने लगी। इसके अलावा रॉबर्ट क्लाइव को व्यक्तिगत रूप से लाखों रुपये का नजराना और एक बड़ी जागीर मिली, जिससे वह रातों-रात भारत के सबसे अमीर विदेशियों में शामिल हो गया।
Q18. बंगाल के इतिहास में 'मीर जाफर' के नवाब बनने की घटना को 'बंगाल की प्रथम क्रांति' क्यों कहा जाता है?
उत्तर: बिना किसी बड़े संघर्ष के सत्ता का एक नवाब से दूसरे कठपुतली नवाब के हाथ में शांतिपूर्ण हस्तांतरण होना।
स्पष्टीकरण: 28 जून 1757 ई. को क्लाइव ने मीर जाफर को बंगाल के सिंहासन पर बैठाया। इसे इतिहासकारों द्वारा 'बंगाल की प्रथम क्रांति' का नाम दिया गया क्योंकि इसके द्वारा बंगाल की संप्रभुता और शासन की चाबी पूरी तरह से विदेशी व्यापारियों के हाथों में चली गई। नवाब केवल नाम का शासक था, जबकि वास्तविक प्रशासनिक और सैन्य शक्तियाँ फोर्ट विलियम के गवर्नर के पास थीं। इस व्यवस्था ने बंगाल के पारंपरिक प्रशासनिक ढांचे को छिन्न-भिन्न कर दिया और बड़े पैमाने पर संस्थागत भ्रष्टाचार की शुरुआत की।
Q19. मीर जाफर के शासनकाल में ब्रिटिश कंपनी ने बंगाल के खजाने को किस प्रकार लूटा?
उत्तर: असीमित हर्जाने, घूस और उपहारों के माध्यम से खजाना पूरी तरह खाली कर दिया।
स्पष्टीकरण: नवाब बनने के बदले मीर जाफर को अंग्रेजों की अंतहीन मौद्रिक मांगों को पूरा करना पड़ा। उसने कंपनी को युद्ध के हर्जाने के रूप में ₹1 करोड़ 77 लाख दिए, और इसके अलावा क्लाइव, वाटसन और अन्य काउंसिल सदस्यों को लाखों रुपये की व्यक्तिगत घूस दी। जब भी कंपनी को धन की आवश्यकता होती, वे नवाब पर दबाव डालते थे। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि मीर जाफर को अंग्रेजों की मांगें पूरी करने के लिए अपने सोने-चांदी के बर्तन और महल के गहने तक बेचने पड़े, जिससे बंगाल का शाही खजाना पूरी तरह कंगाल हो गया।
भाग 3: मीर कासिम का उत्थान और 'बंगाल की द्वितीय क्रांति'
Q20. वर्ष 1760 ई. में अंग्रेजों ने मीर जाफर को गद्दी से हटाकर किसे बंगाल का नया नवाब बनाया?
उत्तर: मीर कासिम को।
स्पष्टीकरण: 1760 ई. तक आते-आते मीर जाफर अंग्रेजों की लगातार बढ़ती धन की मांग को पूरा करने में पूरी तरह असमर्थ हो गया था, और वह अंदर ही अंदर डचों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ साजिश रचने लगा था (जिसे अंग्रेजों ने बेदरा के युद्ध में नाकाम कर दिया)। इसी बीच कलकत्ता के नए गवर्नर वेन्सिटार्ट ने एक योजना बनाई और मीर जाफर के दामाद 'मीर कासिम' के साथ एक गुप्त समझौता किया। अंग्रेजों ने मीर जाफर पर अक्षमता का आरोप लगाकर उसे गद्दी से उतार दिया और मीर कासिम को नवाब घोषित कर दिया। इतिहास में इस शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन को 'बंगाल की द्वितीय क्रांति' (1760 ई.) कहा जाता है।
Q21. नवाब मीर कासिम ने गद्दी प्राप्त करने के बदले अंग्रेजों को कौन से तीन प्रमुख जिले सौंपे थे?
उत्तर: वर्धमान, मिदनापुर और चटगाँव।
स्पष्टीकरण: 1760 ई. के गुप्त समझौते के तहत मीर कासिम ने नवाब बनते ही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल के तीन सबसे धनी और राजस्व-उत्पादक जिले - वर्धमान, मिदनापुर और चटगाँव हमेशा के लिए सौंप दिए। इन जिलों की पूरी दीवानी (राजस्व वसूलने का अधिकार) कंपनी के पास चली गई, जिससे अंग्रेजों की आय में भारी वृद्धि हुई। इसके अलावा मीर कासिम ने गवर्नर वेन्सिटार्ट को ₹5 लाख और अन्य अंग्रेज अधिकारियों को भारी नकद उपहार दिए, तथा दक्षिण भारत में अंग्रेजों के सैन्य अभियानों के लिए वित्तीय सहायता देना भी स्वीकार किया।
Q22. नवाब मीर कासिम ने अंग्रेजों के प्रभाव और उनकी जासूसी से बचने के लिए अपनी राजधानी कहाँ बदली थी?
उत्तर: मुर्शिदाबाद से मुंगेर (बिहार)।
स्पष्टीकरण: मीर कासिम अपने ससुर मीर जाफर की तरह कमजोर नहीं था; वह एक अत्यंत योग्य, कुशल और स्वतंत्र विचारों वाला नवाब था। वह जानता था कि मुर्शिदाबाद कलकत्ता के बहुत करीब है और वहाँ का पूरा प्रशासनिक माहौल अंग्रेज एजेंटों और जासूसों से भरा हुआ है। इसलिए, अपनी संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने और अंग्रेजों के सीधे हस्तक्षेप से बचने के लिए उसने तुरंत अपनी राजधानी को मुर्शिदाबाद से बदलकर बिहार के 'मुंगेर' में स्थानांतरित कर दिया। यह कदम अंग्रेजों को चुनौती देने की उसकी रणनीति का पहला बड़ा हिस्सा था।
Q23. मुंगेर पहुँचने के बाद मीर कासिम ने अपनी सेना को आधुनिक बनाने के लिए क्या कदम उठाए थे?
उत्तर: सेना का यूरोपीय पद्धति पर पुनर्गठन किया और तोपों तथा बंदूकों के कारखाने स्थापित किए।
स्पष्टीकरण: मीर कासिम समझ गया था कि अगर अंग्रेजों को हराना है, तो पारंपरिक सैन्य व्यवस्था को बदलना होगा। उसने मुंगेर में अपनी सेना को फ्रांसीसी और आर्मेनियाई प्रशिक्षकों (जैसे गुर्गिन खाँ) की देखरेख में 'यूरोपीय तर्ज' पर प्रशिक्षित करना शुरू किया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसने मुंगेर के किले में 'तोपों और अत्याधुनिक तोड़ेदार (मैचलॉक) बंदूकों के निर्माण के लिए एक विशाल कारखाना' स्थापित किया। आज भी मुंगेर में बंदूकों के निर्माण का ऐतिहासिक आधार मीर कासिम के इसी फैसले से जुड़ा हुआ है।
Q24. अंग्रेजों और नवाब मीर कासिम के बीच विवाद का सबसे मुख्य और तात्कालिक कारण क्या था?
उत्तर: अंग्रेजों द्वारा 'दस्तक' (फ्री ट्रेड पास) का दुरुपयोग करना और आंतरिक व्यापार कर का विवाद।
स्पष्टीकरण: मुगल बादशाह द्वारा कंपनी को बंगाल में बिना चुंगी दिए व्यापार करने के लिए 'दस्तक' (एक प्रकार का पास) दिया गया था। कंपनी के कर्मचारी इस दस्तक का दुरुपयोग अपने निजी अवैध व्यापार के लिए कर रहे थे और भारतीय व्यापारियों को भी इसे बेच देते थे। इससे बंगाल सरकार को भारी राजस्व का नुकसान हो रहा था और स्थानीय भारतीय व्यापारी प्रतिस्पर्धा में बर्बाद हो रहे थे। जब अंग्रेजों ने मीर कासिम की बात मानने से इंकार कर दिया, तो नवाब ने एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए पूरे बंगाल से 'सभी प्रकार के आंतरिक व्यापारिक करों को दो वर्षों के लिए पूरी तरह समाप्त कर दिया'। इससे भारतीय और अंग्रेज व्यापारी बराबरी पर आ गए, जिससे अंग्रेज भड़क गए।
भाग 4: बक्सर का युद्ध (1764 ई.) और इलाहाबाद की संधियाँ
Q25. अंग्रेजों से लगातार पराजित होने के बाद मीर कासिम ने शरण लेकर किनके साथ एक शक्तिशाली 'त्रिगुट सैन्य गठबंधन' बनाया था?
उत्तर: अवध के नवाब सुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय।
स्पष्टीकरण: व्यापार कर के विवाद के बाद अंग्रेजों ने 1763 ई. में मीर कासिम के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया और उसे कटवा, गिरिया और सूती के युद्धों में लगातार पराजित किया। मीर कासिम मुंगेर छोड़कर अवध भाग गया। वहाँ उसने ब्रिटिश शक्ति को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए एक महा-गठबंधन तैयार किया। इस गठबंधन में स्वयं मीर कासिम, अवध का शक्तिशाली नवाब 'सुजाउद्दौला' और दिल्ली का भगोड़ा मुगल सम्राट 'शाह आलम द्वितीय' शामिल थे। इन तीनों की संयुक्त सेना की संख्या लगभग 40,000 से 50,000 के बीच थी, जो अंग्रेजों को चुनौती देने के लिए बिहार की ओर बढ़ी।
Q26. भारत का भाग्य तय करने वाला ऐतिहासिक 'बक्सर का युद्ध' किस तारीख को और किसके बीच लड़ा गया था?
उत्तर: 22 अक्टूबर 1764 ई. को संयुक्त भारतीय सेना और अंग्रेजों के बीच।
स्पष्टीकरण: यह निर्णायक युद्ध 22 अक्टूबर 1764 ई. को बिहार के 'बक्सर' (Buxar) नामक स्थान पर गंगा नदी के किनारे लड़ा गया था। एक तरफ मीर कासिम, सुजाउद्दौला और शाह आलम द्वितीय की संयुक्त भारतीय सेना थी, और दूसरी तरफ मेजर हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में एक अत्यंत अनुशासित और आधुनिक ब्रिटिश सेना थी। प्लासी के विपरीत, यह युद्ध कोई छल-कपट नहीं बल्कि दोनों सेनाओं की युद्ध क्षमता की वास्तविक परीक्षा थी। मात्र कुछ ही घंटों की भीषण लड़ाई में अंग्रेजों की सुसंगठित सेना ने संयुक्त भारतीय महाशक्ति को पूरी तरह परास्त कर दिया।
Q27. बक्सर के युद्ध (1764 ई.) में विजयी ब्रिटिश सेना का कमान संभालने वाले मुख्य सैन्य अधिकारी कौन थे?
उत्तर: मेजर हेक्टर मुनरो।
स्पष्टीकरण: बक्सर की लड़ाई में अंग्रेजी सेना का सफल और रणनीतिक नेतृत्व 'मेजर हेक्टर मुनरो' (Hector Munro) ने किया था। मुनरो की युद्ध रणनीति इतनी सटीक थी कि उसने भारतीय सेना की भारी संख्या बल को अपनी छोटी लेकिन तीव्र मारक क्षमता वाली तोपों और अनुशासित पैदल सेना के सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इस जीत ने मुनरो को ब्रिटिश इतिहास के सबसे सफल कमांडरों में शामिल कर दिया, क्योंकि उसने एक साथ तीन बड़े भारतीय शासकों को युद्ध के मैदान में धूल चटाई थी।
Q28. बक्सर के युद्ध को प्लासी के युद्ध की तुलना में अधिक निर्णायक क्यों माना जाता है?
उत्तर: क्योंकि इसने केवल बंगाल के नवाब को नहीं, बल्कि पूरे भारत के मुगल सम्राट और अवध के नवाब को सीधे युद्ध में हराया था।
स्पष्टीकरण: प्लासी का युद्ध केवल एक विश्वासघात था जिसने बंगाल में अंग्रेजों के प्रवेश का रास्ता खोला था, लेकिन बक्सर के युद्ध ने अंग्रेजों की सैन्य श्रेष्ठता को पूरे भारत में स्थापित कर दिया। इस युद्ध में भारत की तीन सबसे बड़ी शक्तियां एक साथ हारी थीं। बक्सर की जीत के बाद अंग्रेजों को चुनौती देने वाली उत्तर भारत में कोई शक्ति नहीं बची। इसने सिद्ध कर दिया कि ब्रिटिश सेना तकनीकी और रणनीतिक रूप से अजेय थी। इस युद्ध के परिणामस्वरूप ही अंग्रेजों का दिल्ली के तख्त और पूरे उत्तर भारत पर अप्रत्यक्ष राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हो गया।
Q29. बक्सर के युद्ध के बाद लॉर्ड क्लाइव ने मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ 12 अगस्त 1765 ई. को कौन सी संधि की थी?
उत्तर: इलाहाबाद की प्रथम संधि।
स्पष्टीकरण: बक्सर की जीत का राजनीतिक लाभ उठाने के लिए रॉबर्ट क्लाइव को दोबारा बंगाल का गवर्नर बनाकर भेजा गया। उसने 12 अगस्त 1765 ई. को मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ 'इलाहाबाद की प्रथम संधि' की। इस संधि के तहत मुगल सम्राट ने ईस्ट इंडिया कंपनी को हमेशा के लिए 'बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी' (भू-राजस्व वसूलने का कानूनी अधिकार) सौंप दी। बदले में कंपनी ने सम्राट को ₹26 लाख वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया और अवध के नवाब से छीने गए कड़ा और इलाहाबाद के जिले सम्राट को सौंप दिए। इस संधि ने अंग्रेजों को बंगाल का वैध शासक बना दिया।
Q30. लॉर्ड क्लाइव ने अवध के नवाब सुजाउद्दौला के साथ 16 अगस्त 1765 ई. को कौन सी संधि की थी?
उत्तर: इलाहाबाद की द्वितीय संधि।
स्पष्टीकरण: क्लाइव ने अपनी कूटनीति के तहत अवध के नवाब सुजाउद्दौला के साथ 16 अगस्त 1765 ई. को 'इलाहाबाद की द्वितीय संधि' की। इस संधि के अनुसार नवाब को युद्ध के हर्जाने के रूप में अंग्रेजों को ₹50 लाख की भारी रकम देनी पड़ी। इसके अलावा, नवाब को इलाहाबाद और कड़ा के जिले छोड़कर मुगल सम्राट को देने पड़े। अंग्रेजों ने अवध की सुरक्षा के नाम पर नवाब के खर्च पर एक ब्रिटिश सेना अवध में तैनात कर दी (जो भविष्य की सहायक संधि का प्रारंभिक रूप थी) और कंपनी को अवध में कर-मुक्त व्यापार करने का अधिकार भी मिल गया।
भाग 5: बंगाल का द्वैध शासन और नवाबों का कालक्रम
Q31. इलाहाबाद की संधियों के बाद रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल में कौन सी विवादित प्रशासनिक व्यवस्था लागू की थी?
उत्तर: द्वैध शासन (Diarchy / Double Government)।
स्पष्टीकरण: वर्ष 1765 ई. में क्लाइव ने बंगाल में 'द्वैध शासन' की शुरुआत की, जिसके तहत शासन को दो भागों में बांट दिया गया: 'दीवानी' (राजस्व वसूलना) और 'निजामत' (प्रशासन, कानून-व्यवस्था और सुरक्षा)। दीवानी का अधिकार सीधे अंग्रेजों के पास आ गया, जबकि निजामत का कार्य नाममात्र के नवाब के हाथों में छोड़ दिया गया। इसका सीधा मतलब था कि अंग्रेजों के पास बिना किसी जिम्मेदारी के असीमित अधिकार और धन आ गया, जबकि नवाब के पास बिना किसी धन या शक्ति के केवल जनता की जिम्मेदारी रह गई। इस दमनकारी व्यवस्था ने बंगाल को आर्थिक रूप से पूरी तरह तबाह कर दिया और 1770 ई. के भीषण अकाल का मुख्य कारण बनी।
Q32. बंगाल के नवाबों का सही ऐतिहासिक कालक्रम (1717 से 1775 ई.) क्या है?
उत्तर: मुर्शिद कुली खाँ से लेकर मुबारक-उद-दौला तक के 11 नवाब।
स्पष्टीकरण: तस्वीर में बंगाल के सभी नवाबों की सूची उनके शासनकाल सहित दी गई है, जो इस प्रकार है:
मुर्शिद कुली खाँ (1715-1727 ई.)
सुजाउद्दीन (1727-1739 ई.)
सरफराज खाँ (1739-1740 ई.)
अलीवर्दी खाँ (1740-1756 ई.)
सिराजुद्दौला (1756-1757 ई.)
मीर जाफर (1757-1760 ई.)
मीर कासिम (1760-1763 ई.)
मीर जाफर (दोबारा: 1763-1765 ई.)
नजमुद्दौला (1765-1766 ई.)
सैफ-उद-दौला (1766-1770 ई.)
मुबारक-उद-दौला (1770-1775 ई.)। यह क्रम परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भाग 6: अंग्रेजों के मैसूर से संबंध और हैदर अली का उत्थान
Q33. विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद मैसूर राज्य पर किस राजवंश का शासन स्थापित हुआ था?
उत्तर: वाडियार (ओडेयार) राजवंश।
स्पष्टीकरण: वर्ष 1612 ई. में राजा वेंकट द्वितीय (विजयनगर साम्राज्य के शासक) की अनुमति से मैसूर में 'वाडियार राजवंश' की स्थापना राजा वाडियार द्वारा की गई थी। 18वीं शताब्दी के मध्य में इस वंश का शासक 'चिक्का कृष्णराज द्वितीय' था। वह केवल नाम का राजा था, जबकि मैसूर की वास्तविक प्रशासनिक और सैन्य शक्तियाँ दो भाइयों - देवराज (शहनाई कमांडर) और नंजराज (सर्वाधिकारी या वित्त मंत्री) के हाथों में केंद्रित थीं। इसी कमजोर राजनीतिक माहौल के बीच एक साधारण सैनिक के रूप में हैदर अली का उदय हुआ।
Q34. मैसूर के इतिहास को बदलने वाले महान शासक 'हैदर अली' का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर: 1721 ई. में बूढीकोट (कोलार, कर्नाटक) में।
स्पष्टीकरण: हैदर अली का जन्म 1721 ई. में एक अत्यंत साधारण परिवार में हुआ था। उसके पिता फतेह मोहम्मद मैसूर सेना में एक छोटे किलेदार या सैनिक थे। हैदर अली बचपन में औपचारिक रूप से शिक्षित नहीं हो सका और वह पूरी तरह निरक्षर था, लेकिन वह असाधारण रूप से कुशाग्र बुद्धि, साहसी, सैन्य रणनीति में निपुण और कूटनीतिक रूप से चतुर था। उसने मैसूर की सेना में एक सामान्य घुड़सवार सैनिक के रूप में अपना जीवन शुरू किया और अपनी योग्यता के बल पर तेजी से ऊंचे पदों पर पहुँच गया।
Q35. हैदर अली ने वर्ष 1755 ई. में फ्रांसीसियों की मदद से कहाँ एक आधुनिक शस्त्रागार (अस्त्रागार) स्थापित किया था?
उत्तर: डिंडिगल (तमिलनाडु) में।
स्पष्टीकरण: जब हैदर अली को डिंडिगल का फौजदार (गवर्नर) नियुक्त किया गया, तो उसने महसूस किया कि मराठों और अंग्रेजों की आधुनिक सेना का मुकाबला करने के लिए पारंपरिक हथियार नाकाफी हैं। उसने फ्रांसीसी अधिकारियों और इंजीनियरों की तकनीकी सहायता ली और 1755 ई. में डिंडिगल के किले में 'यूरोपीय तर्ज पर एक आधुनिक तोपखाने और हथियारों के कारखाने' की नींव रखी। उसने अपनी सेना को पश्चिमी पद्धति पर ड्रिल और अनुशासन सिखाया, जिससे उसकी सैन्य शक्ति कई गुना बढ़ गई।
Q36. हैदर अली को मैसूर राज्य का वास्तविक सर्वोपरि शासक (सुल्तान) बनने में किस वर्ष सफलता मिली?
उत्तर: 1761 ई. में।
स्पष्टीकरण: अपनी बढ़ती सैन्य ताकत और लोकप्रियता के बल पर हैदर अली ने मैसूर के राजमहल की गुटबाजी का फायदा उठाया। उसने मैसूर को वित्तीय संकट और मराठों के लगातार आक्रमणों से बचाया। वर्ष 1761 ई. में उसने मैसूर के शक्तिशाली मंत्री नंजराज को नजरबंद कर दिया और राजा चिक्का कृष्णराज को नाममात्र का शासक बनाकर मैसूर की पूरी सत्ता अपने हाथों में ले ली। इस प्रकार, उसने बिना किसी राजसी पृष्ठभूमि के खुद को मैसूर का वास्तविक सर्वेसर्वा और सर्वेक्षक स्थापित किया।
Q37. हैदर अली ने शासन चलाने और वित्तीय सुधारों के लिए किस योग्य ब्राह्मण को अपना मुख्य सहयोगी और प्रधानमंत्री बनाया था?
उत्तर: खांडेराव नामक ब्राह्मण को।
स्पष्टीकरण: हालांकि हैदर अली निरक्षर था, लेकिन वह प्रशासनिक और वित्तीय कार्यों में बेहद कुशल था और धार्मिक रूप से अत्यंत सहिष्णु था। उसने मैसूर के राजस्व को व्यवस्थित करने, भ्रष्टाचार को रोकने और राज्य की आय बढ़ाने के लिए 'खांडेराव' नामक एक अत्यंत चतुर और योग्य ब्राह्मण को अपना मुख्य सलाहकार और दीवान नियुक्त किया था। खांडेराव की प्रशासनिक सूझबूझ के कारण मैसूर की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हो गई, जिससे हैदर अली को एक विशाल और आधुनिक स्थायी सेना का खर्च उठाने में मदद मिली।
भाग 7: प्रथम और द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध तथा हैदर अली की मृत्यु
Q38. प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767 - 1769 ई.) का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर: अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति और मैसूर की बढ़ती शक्ति से उनका डर।
स्पष्टीकरण: मद्रास के अंग्रेज अधिकारी हैदर अली की बढ़ती सैन्य शक्ति, फ्रांसीसियों से उसके घनिष्ठ संबंधों और मालाबार तट पर उसके नियंत्रण से बेहद डरे हुए थे। अंग्रेजों ने हैदर अली को घेरने के लिए हैदराबाद के निजाम और मराठों के साथ मिलकर एक 'त्रिपक्षीय गठबंधन' बनाया। लेकिन हैदर अली ने अपनी बेजोड़ कूटनीति से मराठों को धन देकर और निजाम को क्षेत्र का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया और अंग्रेजों को अकेला कर दिया। इसके बाद 1767 ई. में दोनों शक्तियों के बीच खुला युद्ध छिड़ गया।
Q39. प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध का अंत किस प्रसिद्ध संधि के द्वारा हुआ और इसकी क्या मुख्य विशेषता थी?
उत्तर: 1769 ई. की 'मद्रास की संधि' द्वारा।
स्पष्टीकरण: युद्ध के दौरान हैदर अली ने अंग्रेजों को जबरदस्त शिकस्त दी। उसने ब्रिटिश सेना को खदेड़ते हुए सीधे अंग्रेजों के मुख्य केंद्र 'मद्रास' के किले (फोर्ट सेंट जॉर्ज) को चारों तरफ से घेर लिया। विवश होकर मद्रास सरकार को अप्रैल 1769 ई. में हैदर अली की शर्तों पर 'मद्रास की संधि' करनी पड़ी। इस संधि के तहत दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के जीते हुए क्षेत्र और युद्धबंदियों को लौटा दिया। सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि यदि कोई बाहरी शक्ति (जैसे मराठे) मैसूर पर हमला करेगी, तो अंग्रेज हैदर अली की सैन्य सहायता करेंगे। यह अंग्रेजों के लिए अत्यधिक अपमानजनक संधि थी।
Q40. द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780 - 1784 ई.) के छिड़ने का मुख्य तात्कालिक कारण क्या था?
उत्तर: अंग्रेजों द्वारा माहे (फ्रांसीसी बस्ती) पर आक्रमण करना और मद्रास की संधि का उल्लंघन।
स्पष्टीकरण: जब 1771 ई. में मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किया, तो अंग्रेजों ने मद्रास की संधि के वादे के बावजूद हैदर अली की कोई मदद नहीं की, जिससे हैदर अली बेहद नाराज था। इसी बीच, अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम के कारण यूरोप में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच युद्ध छिड़ गया। अंग्रेजों ने भारत में फ्रांसीसियों को कमजोर करने के लिए मैसूर के नियंत्रण वाले मालाबार तट पर स्थित 'माहे' (Mahe) नामक फ्रांसीसी बंदरगाह पर कब्जा कर लिया। माहे हैदर अली के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि यहीं से उसे फ्रांसीसी हथियार मिलते थे। इसे अपनी संप्रभुता पर सीधा हमला मानकर हैदर अली ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी।
Q41. द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान वर्ष 1781 ई. में 'पोर्टो नोवो के युद्ध' में ब्रिटिश सेना का नेतृत्व किसने किया था?
उत्तर: सर आयर कूट ने।
स्पष्टीकरण: युद्ध की शुरुआत में हैदर अली ने कर्नल बेली को बुरी तरह हराकर अर्काट पर कब्जा कर लिया था। इस संकट से निपटने के लिए वारेन हेस्टिंग्स ने बंगाल से अपने सबसे अनुभवी जनरल 'सर आयर कूट' को मद्रास भेजा। सर आयर कूट ने कूटनीति के जरिए निजाम और मराठों को हैदर अली से अलग कर दिया। जुलाई 1781 ई. में 'पोर्टो नोवो' (Porto Novo) के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें हैदर अली को पीछे हटना पड़ा, हालांकि इस जीत से भी अंग्रेज मैसूर की शक्ति को पूरी तरह कुचल नहीं सके।
Q42. मैसूर के महान योद्धा हैदर अली की मृत्यु कब और किस कारण से हुई थी?
उत्तर: 7 दिसंबर 1782 ई. को द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान कैंसर के कारण।
स्पष्टीकरण: हैदर अली लंबे समय से पीठ के एक गंभीर फोड़े (कैंसर/ट्यूमर) से पीड़ित था। युद्ध की भीषण भागदौड़ और अत्यधिक मानसिक तनाव के कारण उसका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया। अंततः, 7 दिसंबर 1782 ई. को युद्ध के मैदान के पास ही कैंप में उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के समय द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध अपने चरम पर था। मैसूर सेना का मनोबल बनाए रखने के लिए उसकी मृत्यु की खबर को कुछ दिनों तक गुप्त रखा गया, जब तक कि उसका पुत्र टीपू सुल्तान सेना की कमान संभालने के लिए मुस्तैद नहीं हो गया।
भाग 8: टीपू सुल्तान का शासन, जैकोबिन क्लब और उसकी नीतियां
Q43. हैदर अली की मृत्यु के बाद मैसूर का नया सुल्तान कौन बना और उसने द्वितीय युद्ध को कैसे जारी रखा?
उत्तर: टीपू सुल्तान।
स्पष्टीकरण: हैदर अली की मृत्यु के बाद उसका पराक्रमी और अत्यधिक शिक्षित पुत्र 'टीपू सुल्तान' (Tipu Sultan) दिसंबर 1782 ई. में मैसूर की गद्दी पर बैठा। उसने बिना समय गंवाए अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध को पूरी आक्रामकता से जारी रखा। उसने ब्रिटिश कमांडर ब्रिगेडियर जनरल मैथ्यूज को सेना सहित आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया। टीपू की सैन्य कुशलता के कारण अंग्रेज घुटने टेकने पर मजबूर हो गए, क्योंकि वे इस लंबे खिंचते युद्ध के कारण भारी वित्तीय संकट से गुजर रहे थे।
Q44. द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की समाप्ति वर्ष 1784 ई. में किस प्रसिद्ध संधि के माध्यम से हुई थी?
उत्तर: मंगलौर की संधि (Treaty of Mangalore)।
स्पष्टीकरण: मार्च 1784 ई. में दोनों पक्षों के बीच 'मंगलौर की संधि' पर हस्ताक्षर किए गए, जिससे द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध समाप्त हुआ। इस संधि पर टीपू सुल्तान और मद्रास के ब्रिटिश गवर्नर लॉर्ड मैकार्टनी ने हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के जीते हुए भूभाग और युद्धबंदियों को ससम्मान वापस कर दिया। इस संधि पर तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स अत्यधिक क्रोधित हुआ था और उसने कहा था कि "यह लॉर्ड मैकार्टनी कैसा आदमी है? मैं अभी भी विश्वास करता हूँ कि वह संधि के बावजूद हमारे पूरे भारत के साम्राज्य को खो देगा।"
Q45. टीपू सुल्तान को इतिहास में किस उपनाम या उपाधि से जाना जाता है?
उत्तर: 'मैसूर का शेर' (Tiger of Mysore)।
स्पष्टीकरण: टीपू सुल्तान को उसकी अदम्य वीरता, निडरता और अंग्रेजों के खिलाफ कभी न झुकने वाले स्वाभिमान के कारण 'मैसूर का शेर' कहा जाता है। उसके बारे में एक प्रसिद्ध कथन है कि "भेड़ की तरह एक लंबी जिंदगी जीने से बेहतर है, शेर की तरह एक दिन जीना।" उसने अपने राजसी प्रतीकों, झंडों और यहाँ तक कि अपने सिंहासन और तोपों पर भी शेर की आकृतियाँ और चित्र बनवाए थे। वह अपनी प्रजा के बीच एक अत्यंत लोकप्रिय और न्यायप्रिय शासक के रूप में जाना जाता था।
Q46. टीपू सुल्तान ने फ्रांस की महान क्रांति (1789 ई.) से प्रभावित होकर अपनी राजधानी में किस प्रसिद्ध क्लब की स्थापना की थी?
उत्तर: जैकोबिन क्लब (Jacobin Club)।
स्पष्टीकरण: टीपू सुल्तान भारत का पहला ऐसा शासक था जो वैश्विक घटनाओं और क्रांतियों में गहरी रुचि रखता था। वह 1789 ई. की फ्रांसीसी क्रांति के स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के विचारों से अत्यधिक प्रभावित था। उसने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम में फ्रांसीसी सैनिकों के सहयोग से 'जैकोबिन क्लब' की स्थापना की और स्वयं उसका सदस्य बना। वह खुद को 'नागरिक टीपू' (Citizen Tipu) कहलाना पसंद करता था, जो यह दर्शाता है कि वह पारंपरिक राजाओं की तुलना में आधुनिक लोकतांत्रिक विचारों के प्रति कितना आकर्षित था।
Q47. टीपू सुल्तान ने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम में फ्रांसीसी-मैसूर मित्रता के प्रतीक के रूप में क्या लगाया था?
उत्तर: स्वतंत्रता का वृक्ष (Tree of Liberty)।
स्पष्टीकरण: ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ फ्रांसीसियों के साथ अपने गठबंधन को मजबूत करने और फ्रांसीसी क्रांति के आदर्शों का सम्मान करने के लिए टीपू सुल्तान ने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम के महल परिसर में 'स्वतंत्रता का वृक्ष' (Tree of Liberty) लगाया था। यह कदम अंग्रेजों के लिए एक सीधा राजनीतिक संदेश था कि मैसूर अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के सहयोग से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत से बाहर निकालने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस घटना ने अंग्रेजों को टीपू के खिलाफ और अधिक आक्रामक बना दिया।
Q48. टीपू सुल्तान के प्रशासनिक, आर्थिक और नौसैनिक सुधारों की मुख्य विशेषताएं क्या थीं?
उत्तर: नया कैलेंडर लागू करना, आधुनिक नौसेना का गठन और विदेशों में दूतावास स्थापित करना।
स्पष्टीकरण: टीपू एक नवप्रवर्तनकारी (Innovative) शासक था। उसने अपने राज्य में एक बिल्कुल नया पंचांग (कैलेंडर), नए सिक्के और माप-तौल की आधुनिक प्रणाली लागू की। उसने मैसूर की व्यापारिक शक्ति बढ़ाने के लिए 'व्यापार बोर्ड' का गठन किया और विदेशों (जैसे फ्रांस, तुर्की, अफगानिस्तान, ईरान और मॉरीशस) में अपने राजनयिक दूत और दूतावास (Embassies) भेजे ताकि अंग्रेजों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाया जा सके और व्यापार बढ़ाया जा सके। इसके अलावा उसने आधुनिक जहाजों के निर्माण के लिए मंगलौर और वाजिदाबाद में डॉकयार्ड बनवाए और एक 'नौसेना बोर्ड' का गठन किया।
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